‘कलम का गांधी ‘ पुस्तक का लोकार्पण, वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला को प्रथम ‘कुंवर प्रसून सम्मान–2026’
उदंकार न्यूज
देहरादून । दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से चिपको आंदोलन के अग्रणी जननायक, प्रखर पत्रकार, पर्यावरण योद्धा और सामाजिक कार्यकर्ता कुंवर प्रसून के पर्यावरणीय एवं सामाजिक सरोकारों पर बुधवार को केन्द्र के सभागार में एक विचार गोष्ठी आयोजित की गई।
इस अवसर पर पत्रकार एवं लेखक शीशपाल गुसाईं द्वारा कुंवर प्रसून के जीवन, संघर्ष, पत्रकारिता और जन-सरोकारों पर लिखी गई पुस्तक ‘कलम का गांधी : कुंवर प्रसून और जन-सरोकार’ का लोकार्पण भी किया गया।
पुस्तक का लोकार्पण कुंवर प्रसून की पत्नी श्रीमती रंजना भंडारी तथा मंचासीन अतिथियों और वक्ताओं की उपस्थिति में किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कुंवर प्रसून के चिपको आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण, जनपक्षधर पत्रकारिता, बीज संरक्षण, समान शिक्षा, खनन विरोध, टिहरी बांध विरोध तथा सामाजिक आंदोलनों में दिए गए योगदान को याद करते हुए कहा कि कुंवर प्रसून विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। हिमालय, जंगल, जल, जमीन और जनता के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष इतिहास में सदैव अंकित रहेगा।
कार्यक्रम में प्रो. जयंत बंद्योपाध्याय, विशिष्ट फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, कोलकाता; विजय जड़धारी, प्रणेता, बीज बचाओ आंदोलन, जड़धार गांव, टिहरी; राजीव लोचन साह, संपादक, नैनीताल समाचार, नैनीताल; राजीव नयन बहुगुणा, वरिष्ठ पत्रकार, देहरादून; जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार, देहरादून तथा संजय कोठियाल, संपादक, युगवाणी थे ।
युगवाणी के संपादक संजय कोठियाल ने कहा कि कुंवर प्रसून जैसा पत्रकार होना बहुत मुश्किल है। उन्होंने युगवाणी में अनेक कालजयी रिपोर्टें लिखीं, जो आज भी पत्रकारिता की अमूल्य धरोहर हैं।
राजीव लोचन साह ने कहा कि कुंवर प्रसून को निरंतर याद किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रसून से जुड़ा एक प्रेरक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि 1974 की अस्कोट–आराकोट यात्रा के दौरान उनकी चप्पल टूट गई थी। तब प्रसून ने संकल्प लिया कि जब तक उन्हें अहिंसक चप्पल नहीं मिलेगी, वे नई चप्पल नहीं पहनेंगे। उनका कहना था कि वे केवल ऐसे पशु के चमड़े से बनी चप्पल पहनेंगे, जिसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से हुई हो।
राजीव नयन बहुगुणा ने कहा, “कुंवर प्रसून ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। वे खरा सोना थे।”
वक्ताओं ने कहा कि कुंवर प्रसून केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि जनचेतना की एक सशक्त धारा थे। उन्होंने अपने जीवन में सत्ता और व्यवस्था से समझौता करने के बजाय हमेशा जनता, प्रकृति और सत्य का पक्ष चुना।
लेखक शीशपाल गुसाईं ने बताया कि ‘कलम का गांधी : कुंवर प्रसून और जन-सरोकार’ केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पर्यावरणीय, सामाजिक और जनवादी आंदोलनों के एक महत्वपूर्ण कालखंड का दस्तावेज है। 244 पृष्ठों और 54 अध्यायों में विस्तृत यह पुस्तक लगभग दो वर्षों के शोध, अध्ययन, साक्षात्कारों और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई है।
कुंवर प्रसून के चिपको आंदोलन में योगदान को विशेष रूप से याद किया गया। पुस्तक में कुंवर प्रसून के कृषि और बीज संरक्षण संबंधी कार्यों को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। पुस्तक में पारंपरिक बीजों, जैव विविधता और हिमालयी कृषि को लेकर उनके विचारों और प्रयासों को विस्तार से दर्ज किया गया है।
इस अवसर पर कुंवर प्रसून स्मृति मंच की ओर से उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला को प्रथम ‘कुंवर प्रसून स्मृति पर्यावरण एवं जनपक्षधर पत्रकारिता सम्मान–2026’ से सम्मानित किया गया। सम्मान के अंतर्गत उन्हें ₹11,000 की सम्मान राशि, सम्मान-पत्र और अंगवस्त्र प्रदान किया गया। सम्मान-पत्र का वाचन प्रो. अनुपम भंडारी ने किया। मंचासीन अतिथियों, मुख्य वक्ताओं तथा कुंवर प्रसून की पत्नी श्रीमती रंजना भंडारी की उपस्थिति में यह सम्मान प्रदान किया गया।
इस मौके पर पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू, वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवाड़ी, पूर्व सूचना आयुक्त योगेश भट्ट,दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी. के. पाण्डे,दिनेश जोशी, डॉ लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट सहित तमाम पत्रकार ,साहित्यकार पर्यावरण विद तथा राज्य आंदोलनकारी लोग मौजूद थे।