भाजपा के लिए बहुत पहले ही हो गए थे ‘खंडूरी जरूरी’, वर्ष 2012 में बेशक नारा दिया, लेकिन नब्बे में ही समझ ली थी जरूरत
विपिन बनियाल
-वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी के चेहरे पर चुनाव लड़ा और नारा दिया -खंडूरी है जरूरी। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभूतपूर्व आंदोलन की पृष्ठभूमि में भाजपा हाईकमान ने उत्तराखंड के जिस राजनेता पर सबसे ज्यादा भरोसा किया, वह खंडूरी ही थे। उत्तराखंड के चुनावी इतिहास में ऐसा उदाहरण ढूंढने से भी नहीं मिलता, जब किसी राजनीतिक दल ने अपने किसी एक नेता को भावी मुख्यमंत्री घोषित किया। यह जरूर दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि खंडूरी कोटद्वार से खुद चुनाव हार गए, लेकिन उनकी ईमानदार छवि भाजपा को सत्तारूढ़ दल होने के बावजूद चुनाव में बहुत शानदार प्रदर्शन की तरफ ले गई थी।
वैसे, भाजपा हाईकमान ने भले ही वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में खंडूरी है जरूरी का नारा दिया, लेकिन देखा जाए, तो नब्बे के दशक में उत्तराखंड में पैर जमाने की कोशिश कर रही भाजपा ने तब भी उनकी जरूरत महसूस की थी। दरअसल, तब बहुत शोर उठा था कि कोई फौजी अफसर गढ़वाल लोकसभा सीट से इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लडे़गा। भाजपा उस गढ़वाल लोकसभा सीट को हर हाल में जीतना चाहती थी, जिसका प्रतिनिधित्व हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे दिग्गज राजनेता कर चुके थे। राम जन्मभूमि आंदोलन की वजह से भाजपा के लिए पहाड़ में उपयुक्त वातावरण तैयार हो चुका था, लेकिन चुनाव में जीत के लिए ऐसा प्रत्याशी भी जरूरी था, जिसे मतदाता सिर आंखों में बैठा लेते। इस संसदीय क्षेत्र में पूर्व सैनिकों की संख्या भी अच्छी खासी थी। ऐसे में हाईकमान के स्तर पर भुवन चंद्र खंडूरी को प्रत्याशी बनाया जाना तय हुआ। उनकी राजनीति पृष्ठभूमि इतनी भर थी कि हेमवती नंदन बहुगुणा उनकी रिश्तेदारी में थे। हालांकि उनका खुद का पूरा जीवन सेना में देश सेवा करते हुए गुजरा था।
भुवन चंद्र खंडूरी के बेहद नजदीकी रहे उमेश त्रिपाठी बताते हैं-जब प्रत्याशी घोषित होने के बाद खंडूरी जी गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार में पहली बार आए थे, तो उनका कौडिया कैंप में ऐसा स्वागत हुआ था, जो पहले कभी किसी का नहीं हुआ था। लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया और वह लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से विजयी घोषित हुए।
खंडूरी इसके बाद, कई बार सांसद रहे। केंद्र में सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री तक रहे। बाद में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी बने। वह चाहे जिस भूमिका में रहे हों, लेकिन ईमानदारी और अनुशासन जैसे मूलमंत्र उनके साथ हमेशा चलते रहे। इस वजह से वह राजनीति में कई बार अनफिट जैसे भी लगे, लेकिन फिर भी लोगों का उन पर बेहद भरोसा रहा। खंडूरी के कई चुनाव में उनके लिए महत्वपूर्ण काम करने वाले घनानंद चंदोला कहते हैं-कई बार ऐसा भी हुआ, जबकि खंडूरी जी के चुनाव में बजट का अभाव रहा। सेना के दौरान जमा किए गए रूपये-पैसे उन्होंने चुनाव में लगाए, लेकिन किसी तरह का समझौता नहीं किया।
जनरल खंडूरी के निधन को उत्तराखंड के बडे़ नुकसान के रूप में देखा जा रहा है। दुबई निवासी धनंजय रतूड़ी की ने प्रतिक्रिया व्यक्त की-खंडूरी भाजपा के लिए ही नहीं, उत्तराखंड के लिए जरूरी थे, क्योंकि राजनीति में सुचिता का उन्होंने अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। अलविदा जनरल खंडूरी!