अलविदा जनरल खंडूरी ! आप हर भूमिका में शानदार रहे

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विपिन बनियाल
-जनरल खंडूरी अनंत यात्रा पर चले गए। मन उदास है। बहुत सारी बातें हैं, उनसे जुड़ीं। किसे साझा करूं, किसे नहीं, तय करना मुश्किल है। वर्ष 1990 की बात करते हैं। न राजनीति की तब बहुत ज्यादा समझ थी और ना पत्रकारिता से जुड़ाव था। एक शोर उठा था कि भाजपा से रिटायर्ड मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी को चुनाव में प्रत्याशी बनाया जा रहा है। इससे पहले, गढ़वाल लोक सभा सीट पर भाजपा का झंडा मनोहरकांत ध्यानी उठाए रहते थे। मगर तब पार्टी का कोई आधार नहीं था। कोटद्वार काशीरामपुर तल्ला में, जहां मेरा घर है, वहां हम नेता के नाम पर स्वर्गीय चंद्रमोहन सिंह नेगी को ही जानते थे, क्योंकि वह हमारे निकट पड़ोसी थे। उनके यहां ही हमने बचपन में वीपी सिंह और तमाम अन्य हस्तियों को आते-जाते देखा था। खैर, खंडूरी जी चुनाव लडे़ और शानदार तरीके से जीत गए। राम जन्मभूमि आंदोलन से भाजपा का आधार मजबूत हुआ था। पूर्व सैन्य अधिकारी भुवन चंद्र खंडूरी की छवि का जादू भी पूूर्व सैनिकों और अन्य मतदाताओं पर जमकर चला था। इसके अलावा, वह हेमवती नंदन बहुगुणा के रिश्तेदार थे, यह तथ्य भी कहीं न कहीं उनके पक्ष में गया था।
काॅलेज के दिनों में मैं अमर उजाला कोटद्वार के आॅफिस में अनूप मिश्रा जी के साथ बैठकर पत्रकारिता सीखने लगा था। एक दिन मिश्रा जी ने कहा-विपिन तुम आज खंडूरी जी के साथ चले जाओ। सतपुली के पास एक गांव में उनका कार्यक्रम है। खंडूरी जी के साथ पहली बार इतनी देर साथ रहने का अवसर मिला था। उनके व्यक्तित्व में साफगोई के उस दिन पहली बार दर्शन हुए। बिना किसी लाग लपेट के वह लोगों से सीधी बात कर रहे थे और सरलता से मिल रहे थे। उनका भाषण हालांकि आकर्षक नहीं था, क्योंकि उन्होंने कभी राजनीतिक भाषण दिए ही नहीं थे। यह जरूर है, कि बाद में उनके भाषण अच्छे होने लगे थे।
खैर, उसकेे बाद खंडूरी जी से लगातार मुलाकातें होने लगीं। वर्ष 1995 में मैं जब अमर उजाला के लिए श्रीनगर से काम करने लगा, तब तो अक्सर उनसे भेंट होती। दिल्ली से वह अक्सर फोन कर लिया करते थे। मैं उनकी सादगी और ईमानदारी का कायल रहा। राजनीति के अपने तकाजे होते हैं। कई काम उन्हें मन मसोस के भी करने पडे़ होंगे, लेकिन मैं जानता हूं कि मूूल रूप से वह एक रचनात्मक व्यक्तित्व वाले राजनेता थे। उन्होंने एक शानदार जीवन जिया। पहले, सेेना में अफसर, फिर एक सांसद, केंद्रीय मंत्री और फिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री। हर भूमिका में उन्होंने अपने अंदाज से अलग छाप छोड़ी। उनकेे व्यक्तित्व में बनावट का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं देखा। जो कहना है, वह एकदम स्पष्ट और बेबाक। फिर चाहे अंजाम कुछ भी क्यों न हो। मैने अपने लिए उनके व्यवहार को कभी रत्ती भर भी बदला हुआ नहीं पाया। चुनाव के दौरान कई बार मैने साफ महसूस किया कि चुनावी पैंतरेबाजी का सामना करते हुए वह असहज हुए। उन्होंने कभी ऐसा माहौल देखा नहीं था। इसलिए उनका असहज होना अस्वाभाविक नहीं था। उनकी ईमानदार और साफ सुथरी छवि का ही असर रहा, कि वर्ष 2012 में उन्हें भाजपा ने सीएम कैंडिडेट घोषित किया। ऐसे दूसरे उदाहरण ढूंढ के भी नहीं मिलते। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय में पहले राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने। इतना अच्छा काम किया, कि अटल जी ने कैबिनेट मंत्री ही बना दिया। ऐसा उदाहरण भी मैने उत्तराखंड की राजनीति में कोई दूसरा नहीं देखा, जबकि मुख्यमंत्री पद से हटा दिए जाने के बाद किसी नेता को विधानसभा के उसी कार्यकाल में दोबारा से वो ही जिम्मेदारी दे दी गई हो। उनसे जुड़ीं तमाम सारी और भी बातें हैं। कई संस्मरण हैं। उनका व्यक्तित्व महान रहा है। वह जहां भी रहें, खुश रहें। उन्हें नमन। भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

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