कर्नल कोठियाल की स्मृतियों में ताजा है आतंकियों से किया संघर्ष, जांबाजी के कई किस्से
विपिन बनियाल
– कर्नल अजय कोठियाल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सेना में रहते हुए उनकी जांबाजी के कई किस्से मशहूर हैं। कर्नल कोठियाल के पास जम्मू कश्मीर में तैनाती के दौरान आतंकियों से मुठभेड़ के कई संस्मरण हैं, जो कई वर्षों बाद भी ताजा हैं।
सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक एवं लेखक केएस चौहान की हालिया रिलीज किताब ‘पहलगाम . . .जब समय थम सा गया’ में कर्नल कोठियाल ने बकायदा एक विशेष लेख लिखकर अपने संस्मरणों को साझा किया है। कर्नल कोठियाल के अनुसार-मैने अपनी जिंदगी के 28 वर्ष भारतीय सेना का हिस्सा बनकर व्यतीत किए। इनमें से 20 वर्ष जम्मू-कश्मीर में सक्रियता रही। कह सकते हैं कि अपने सैन्य जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा जम्मू-कश्मीर में रहकर गुजारा। आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन में ज्यादातर सक्रियता रही। जम्मू-कश्मीर के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व अन्य पहलुओं को बारीकी से समझने-बूझने का मुझे मौका मिला। पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को आतंकियों ने जिस लोमहर्षक घटना को अंजाम दिया, वह पूरे देश को स्तब्ध करने वाला रहा। हिंसा का सहारा लेकर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने की मनोवृत्ति बहुत पुरानी रही है।
बकौल, कर्नल कोठियाल-मुझे अच्छे से याद है कि जब भारतीय सेना में मेरे शुरूआती दिन थे, तब वर्ष 1995 में इस क्षेत्र में आतंकी संगठन अलफरान ने विदेशी पर्यटकों का अपहरण कर लिया था। इसमें से एक पर्यटक को उन्होंने मार दिया था, जबकि एक पर्यटक उनके चंगुल से भाग निकला था। तीन पर्यटक लापता हो गए थे। यानी कह सकते हैं कि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए आतंकी संगठन ऐसा करते रहे हैं। मगर ये भी हकीकत अपनी जगह है कि भारतीय सेना और सुरक्षा बलों ने आतंकियों को कुचलने में कोई कमी नहीं की है। सोफिया पुलवामा में आतंकियों से मुठभेड़ की घटना मुझे हमेशा रोमांचित करती है। सुरक्षाबलों के सामने पडे़ सात आतंकियों के शव वाली तस्वीर मेरे पास आज भी सुरक्षित है। मै गौरवान्वित महसूस करता हूं कि आतंकियों को नेस्तानाबूत करने वाले इस अभियान का मैं अहम हिस्सा था। इस अभियान से पहले आतंकियों की खबर लेने के लिए खुफिया तरीके से किए गए प्रयासों की अलग कहानी है। कुर्ता-पायजामा पहनकर, दाड़ी बढ़ाकर पागलों की तरह घूम-फिरकर सटीक जानकारी जुटाने का अपना रोमांच रहा। फिर खुशी इस बात की रही कि हमारी पूरी टीम के प्रयास सार्थक साबित हुए।
सेना के रिटायर्ड कर्नल कोठियाल कहते हैं-एक अलग घटना और याद आती है। सोफिया पुलवामा क्षेत्र के एक गांव को हमारी टीम ने आतंकियों की मौजूदगी की सूचना पर रात को घेर लिया था। एक-एक करके हर घर खाली कराया जा रहा था। इस प्रक्रिया में कई घंटे लगे। आम लोगों की जान बचाकर आतंकियों को ढेर करने का मकसद था। जब लगभग पूरा गांव खाली हो गया, तो सारी उम्मीद एक घर पर केंद्रित हो गई थीं। अब सवाल था कि उस घर के भीतर कौन घुसेगा। मै और मेरे कुछ साथी इस टाॅस्क के लिए चयनित हुए। हम अंदर गए थे, तो आतंकी मिले। हमने उन्हें दबोच लिया, लेकिन जवाबी कार्रवाई में मेरे शरीर में दो जगह गोली लग गई। आनन-फानन में हाॅस्पिटल पहुंचाया गया। उपचार चला, पर संतोष इस बात का रहा कि आतंकियों के खिलाफ चले हमारे ऑपरेशन को सफलता मिली। कीर्ति चक्र, शौर्य चक्र और विशिष्ट सेवा मेडल जैसे सम्मान मुझे गर्व से भर देते हैं।
इन स्थितियों के बीच, जब पहलगाम जैसी घटना सामने आती है, तो यह ना सिर्फ हमें गहरे गम और गुस्से से भर देती है, बल्कि यह सोचने को भी मजबूर करती है कि चुनौती अभी शेष है। हालांकि जम्मूू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद वहां के हालात में तेजी से सकारात्मक बदलाव आया है। देश के साथ जम्मू-कश्मीर के संबंध अब और भी अटूट हुआ है। यह असाधारण और अभूतपूर्व काम है। इसी तरह, ऑपरेशन सिंदूर के रूप में एक नए भारत को पूरी दुनिया ने देखा है, जो कि पहले से कहीं ज्यादा निर्भीक और निडर है। जो अपने विरोधियों को घर में घुसकर मारना जानता है। अपने नागरिकों के खून का बदला लेने की जिसमें ताकत और हिम्मत है। पहलगाम की घटना को किसी तरह की चूक मानने की बात खारिज करने लायक है। हां, ये जरूर है कि सरकार की तमाम एजेंसियों के बीच तालमेल की लगातार समीक्षा होती रहनी चाहिए। यह तालमेल ही जम्मू-कश्मीर में बडे़ बदलाव का एक प्रमुख कारण रहा है । यह तालमेल निरंतर कायम रहना जरूरी है।