कुछ भी कहते-कहते बहुत कुछ कहती है-‘भौं कुछ’, मुकेश नौटियाल की किताब में पहाड़ की दास्तान
विपिन बनियाल
-पहाड़ी भाषा में ‘भौं कुछ’ का अर्थ होता है-कुछ भी। सरसरी तौर पर देखें, तो भौं कुछ की प्रतिध्वनि यही निकलती है, कि ऐसी बात, जिसकी बहुत गंभीरता नहीं है। मगर अपनी किताब का एक अलग सा टाइटल रखकर कथाकार मुकेश नौटियाल ने उसके भीतर जो रचा है, उसमेें बहुत कुछ है। उसमे गहराई है। गंभीरता है। पहाड़ है, पहाड़ से जुड़ी तमाम सारी बातें हैं। पहाड़ का जीवन है। प्रकृति है। अंदाज है। मिजाज है। दुख-तकलीफ हैं। संघर्ष है। जिजीविषा है। यह किताब मुकेश नौटियाल की कही-अनकही बातों का संपूर्ण दस्तावेज सरीखा है।
इस किताब को पढ़ने के बाद जितेंद्र ठाकुर जैसे प्रख्यात साहित्यकार जब यह कहते हैं- ‘मुकेश नौटियाल का लेखन मुझे रूस के महान लेखक रसूल हमजातोव की गद्यशैली की याद दिलाता है’, तोे उसके मायनेे होेते हैं। प्रख्यात साहित्यकार डाॅ सविता मोहन की टिप्पणी है- ‘यह एक बार में ही पढ़कर खत्म कर देने वाली कृति है।’ उनकी यह टिप्पणी दिलचस्प है- ‘मुकेश नौटियाल के लेखन में तरलता है। सरलता है। उनका लेखन बहता चला जाता है।’
दरअसल, मुकेश नौटियाल ने अपने पहाड़ के संस्मरणों को इतनी खूबसूूरती से अपनी किताब में उकेरा है, कि वह पूरे समय तक पढ़ने वाले को बांधे रखता है। उनके लेखन की शैली आखिर क्या है, इसका जवाब उनसे जानना ही जरूरी है। मुकेश नौटियाल कहते हैं- ‘भौं कुछ के कंटेंट को किसी एक विधा में नहीं बांधा जा सकता। यहां स्मृतियां हैं, आख्यान हैं, कुछ फिक्शन है, थोड़ी कविता है। ऐसे में यह कई विधाओं का मिश्रण है।’ वह उम्मीद करते हैं कि कथेतर साहित्य का यह नया शिल्प पाठकों को जरूर पसंद आएगा।
मुकेश नौटियाल की ‘भौं कुछ ‘ 14 अध्यायों में बंटी 134 पेज की किताब है। अपनी खुद की कहानी कहते-कहते मुकेश नौटियाल इस किताब में बहुत सलीके से हम सभी की कहानी कहतेे हैं। ‘धुंध मेें खोई यादों की तलाश हो ‘ या फिर ‘पोटली में पिता’ के बहानेे मुकेश नौटियाल जो भी कहते हैं, वह बहुत गहरे तक असर करता है। ‘बाजार में अस्पतालः नैतिकता का सवाल ‘ संवेदनहीनता औैर मानवीयता के अंतर को समझाता हुआ संस्मरण है। किताब में सिर्फ गहरी बातें ही नहीं हैं। हल्की-फुल्की बातों का भी समावेश है। मसलन, ‘भड्डू बाहर, कूकर भीतर ‘जैसे संस्मरण गुदगुदाते हैं।
इस किताब पर साहित्यकार अमित श्रीवास्तव की टिप्पणी काबिलेगौर है- ‘यह उस नक्श को टटोलने की कोशिश भी है जिसके धुंधले अक्स धीरे-धीरे अनफोल्ड हो रहे हैं। इसकी आवाज में एक मिठास है और रेखाओं में उजास। इसकी पूरी तरकीब मानव की जिजीविषा की रचनात्मक अभिव्यक्ति है।’
प्रसार भारती के कार्यक्रम प्रमुख अनिल भारती कहते हैं- ‘इसमें पहाड़ों के सौंदर्य का मधुरतम रूप भी है, तो यहां के संघर्षमय जीवन की स्पष्ट झलक भी। ‘ प्रसिद्ध साहित्यकार बीना बेंजवाल के शब्दों में कहें तो ‘भौं कुछ में मुकेश नौटियाल ने जिस खूबसूरती से आंचलिकता को शामिल किया है, वह कमाल का है।’ इस किताब को प्रबोध उनियाल के काव्यांश प्रकाशन नेे प्रकाशित किया है। किताब का आवरण चित्र मुकेश नौटियाल की खुद की पेंटिंग से लिया गया है, जो कि उनके ग्राम देवता को समर्पित है। दून लाइब्रेरी में एक कार्यक्रम में औपचारिक तौर पर इस किताब का लोकार्पण कर दिया गया है। पाठकों को अपने हिसाब से ‘भौं कुछ ‘ की समीक्षा करनी है।