आम आदमी का ‘कुल जमा’ क्या, कुछ सफलताए, कुछ विफलताएं, स्पर्श, आवाज … .!

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विपिन बनियाल
-श्रुति वत्स ने अपने पहले कविता संग्रह का नाम बहुत ठोक-बजाकर रखा है-कुल जमा। वह इसके शीर्षक के चयन की परतों उधेड़कर कहती हैं-आम आदमी की जिंदगी में कुल जमा क्या होता है। कुछ सफलताएं, कुछ विफलताएं, कुछ स्पर्श, कुछ आवाज, कुछ सपने आदि-आदि। अपनी 107 छोटी-बड़ी कविताओं में उन्होंने आम इंसान की कुल जमा चीजों को सामनेे रखनेे की ईमानदार कोशिश की है। इस कोशिश में प्रकृति के रंग निखरे हैं, प्रेम-संवेदना की कोंपल भावनाएं फूटी हैं, सामाजिक विसंगतियों कोे आईना दिखा है। महिलाओं की स्थिति पर खास बात हुई है। और भी तमाम सारी बातें श्रुति वत्स केे इस कविता संग्रह का हिस्सा बनी हैं।
सबसे पहले प्रेम-संवेदना की बात करना उचित रहेगा। श्रुति वत्स क्या खूब लिखा है-कल मेेरे शहर में बारिश थी/कल बूंदों ने तुझको छुआ होगा/कल कोई सहर हुई होगी/कल चांद को कुछ हुआ होगा। एक अन्य कविता में श्रुति कहती हैं-मुझे छिटक देना चांद की छलनी से/किसी घाटी में जुगनुओं की तरह/मेरे शब्दों को लिख देना/पेड़ की झड़ती हुई सूखी पत्तियोें पर/मुझे तोड़ना/रेत के एक-एक कण की तरह/मेरी राख को मल देना/एक अघोरी की देह पर/मुझे पिघलते हुए बहा देना/गांव के उस किनारे वाले तालाब में/मेरे रोम-रोम से बुन देना/उसके बिस्तर की चादर।
श्रुति वत्स के लेखन में महिला विमर्श को खास जगह है। उनके कविता संगह में कई-कई कविताएं केवल और केवल महिलाओं की स्थिति पर है। वह अपनी कविताओं में बंधनों को तोड़ने और प्रगतिशील होने का आह्वान करती हुई भी दिखाई देती हैं। औरतों की मौजूदा स्थिति पर श्रुति खफा दिखती हैं’ वह लिखती हैं-औरतों के चैराहे नहीं होते/जहां चार औरतें करती हों/देश-दुनिया की बातें/औरतों की होती है चहारदीवारी/जिनके बीच, करती हैं वो/सुबह की चाय से लेकर रात की तरकारी का इंतजाम।
शोेषण, असमानता, अन्याय पर अपनी बात कहतेे हुए वह प्रकृति और इंसान की स्थिति को बखूूबी जोड़ती है। इन लाइनों पर गौैर फरमाएं-सुनो देखो, कभी रिसते पहाड़ों को/भरभराकर टूटती चट्टानों को/और फिर देखना कूड़ा बीनते हाथोें को/रिसकर फट चुकी उनकी दरारों को/एक सा दुख पाओगे/आकार में/विस्तार में/भीतर के टकराव में।
रिश्तों की पवित्रता पर बाजारवाद की परत चढ़ते हुए जितना आपनेे-हमनेे देखा है, श्रुति वत्स उससेे आगे जाकर कुछ कहने की कोशिश करती हैं। कहती हैं-अब सब कुछ बाजार है यहां/दुकानों मे सजे सामान/तोहफों में लिपटे ताल्लुकात/खुदा की इबादत/खबरों की इबारत/औलाद की पैदाइश/औकात की नुमाइश/आशनाई का जश्न/मुहब्बतों का गम/यहां सब कुछ बाजार है। अपने पहले कविता संग्रह में श्रुति वत्स ने तमाम सारी बातों को बेलाग, बेलौस लिखा है। कुल जमा, यह भावनाओें का प्रभावशाली प्रकटीकरण है।

‘सरकारी सेवा में रहते हुए यह प्रयास महत्वपूर्ण’
-श्रुति वत्स नरेंद्रनगर में बीडीओ के पद पर कार्यरत हैं। उनके पति प्रख्यात लोक गायक रजनीकांत सेमवाल हैं। श्रुति वत्स के काव्य संग्रह कुल जमा का लोकार्पण बुधवार को काबीना मंत्री सुबोध उनियाल ने यमुना कालोनी स्थित अपने सरकारी आवास में किया। उन्होंने कहा कि सरकारी सेवा में रहते हुए साहित्य सृजन आसान नहीं है, लेकिन युवा अधिकारी श्रुति की साहित्य के प्रति लगन ने इस कार्य को संभव कर दिया। कुल जमा की रचियता श्रुति ने अपने काव्य संग्रह की रूप रेखा को सामने रखा। साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने काव्य संग्रह की समीक्षा की। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार गजेंद्र नौटियाल, बीना बैंजवाल, नीता कुकरेती, चार धाम महा पंचायत के महासचिव डाॅ बृजेश सती, प्रकाशक प्रबोध उनियाल प्रमुख रूप से उपस्थित थे। संचालन सैयद सादाब अली ने किया।

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