अलविदा गोल्डन ब्वॉय! शूटिंग के खेल में सिक्का जमाया, सियासत का खेल समझ नहीं आया
विपिन बनियाल
-जसपाल राणा का खेल जीवन स्वर्णिम उपलब्धियों से भरा रहा है। निश्चित तौर पर वह भारतीय खेल जगत की शान थे। उत्तराखंड के लाल जसपाल राणा के निधन से हर कोई दुखी है। शूटिंग के गोल्डन ब्वॉय जसपाल राणा ने खिलाड़ी के तौर पर बुलंदियों को चूमा। कोच बतौर बेहतरीन साबित हुए। शूटिंग के खेल में भले ही सिक्का जमाया, लेकिन सियासी खेल को वह जीवन भर समझ नहीं पाए। कह सकते हैं कि वह सियासत के लिए बने ही नहीं थे।
कॉमनवेल्थ गेम्स से लेकर एशियाई खेलों के उनके सफर पर निगाह दौड़ाई जाए, तो एक चमकदार तस्वीर उभरती है। इस तस्वीर में 13 स्वर्ण सहित कुल 23 पदक शामिल हैं, जो बताती है कि जसपाल राणा शूटिंग की दुनिया में कैसे महान साबित हुए। ओलंपिक में खुद कोई पदक नहीं जीत पाए, तो अपनी शिष्या मनु भाकर के जरिये एक सपना देखा और दो पदकों के साथ उसे पूरा किया।
जसपाल राणा ने अपनी सियासी पारी भी शुरू की थी, लेकिन वह इसमें चल नहीं पाए। उनके निर्णय आधे-अधूरे और गलत साबित हुए। वर्ष 2009 में वह ऐसे समय में भाजपा के टिकट पर टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव लडे़, जबकि भगवा पार्टी से लोग नाराज थे। बीसी खंडूरी सरकार सख्त फैसले ले रही थी और अच्छा काम कर रही थी, फिर भी लोगों में नाराजगी थी। इसलिए वर्ष 2009 में उत्तराखंड की पांचों सीटों पर भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। जसपाल राणा बेहद लोकप्रिय होते हुए भी कांग्रेस के विजय बहुगुणा से चुनाव हार गए। भाजपा ने जब लोगों के बीच वापसी शुरू की, तब वह कांग्रेस में चले गए। कुल मिलाकर उनका सियासी कैरियर स्थापित नहीं हो पाया। इसके बावजूद, जसपाल राणा एक सितारे का नाम था, जो हमेशा चमकता रहा।
नेगीदा ने दिया नाम-बंदूक्या जसपाल राणा
-उत्तराखंडी लोक संगीत में भी जसपाल राणा का नाम खूब गूंजा। पहाड़ में बाघ के आतंक और जसपाल राणा की अचूक निशानेबाजी का जिक्र करते हुए नरेंद्र सिंह नेगी ने एक गीत बनाया-बंदूक्या जसपाल राणा, सिस्त साध दे, उत्तराखंड मा बाघ लग्यूं, बाघ मार दे। बकौल-नेगीदा, नब्बे के दशक में जिस वक्त कल्जीखाल क्षेत्र में बाघ का आंतक था, उसी वक्त जसपाल राणा ने किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में गोल्ड जीता था। तब कल्जीखाल में एक महिला से उन्हें इस गाने को लिखने की प्रेरणा मिली थी। नेगीदा कहते हैं-इस गाने के संबंध में उनकी जसपाल राणा से कभी बात नहीं हुई।