‘ढोली’ की कामयाबी के बीच ‘जग्वाल’ की याद
विपिन बनियाल
-उत्तराखंडी गढ़वाली फिल्म ‘ढोली ‘ की सफलता अभूतपूर्व है। राष्ट्रीय पुरस्कार, वो भी किसी गढ़वाली फिल्म को। सचमुच, कमाल तो हुआ है। ऐसा कमाल, जोे 43 वर्षोें में पहले कभी नहीं हो पाया। 43 वर्ष पहले ही ‘जग्वाल ‘ की रिलीज के साथ उत्तराखंडी सिनेमा अस्तित्व में आ गया था। तब ‘जग्वाल ‘ ने इतिहास रचा था, अब ये काम ‘ढोली ‘ ने किया है। इन दोनों फिल्मों के साथ एक दिलचस्प बात समान रूप से जुड़ी हुई है। इसके निर्देशक गैर उत्तराखंडी पृष्ठभूमि के रहे हैं, जिन्होंने फिल्म के साथ जुड़कर अपना सौ फीसदी योगदान किया। उत्तराखंड के कलाकारों के भगीरथ प्रयासों ने अपना काम किया, लेकिन इतिहास रचने का जब-जब जिक्र होगा, तब-तब इन निर्देशकों की भूमिका को भी अलग से रेखांकित किया जाएगा।
पहले ‘जग्वाल ‘ की ही बात कर लेते हैं। वर्ष 1983 में ‘जग्वाल ‘ रूपी गंगा को पृथ्वी यानी स्क्रीन पर उतारनेे के लिए पाराशर गौड़ भगीरथ बने। उत्तराखंडी सिनेमा को अस्तित्व में लाने में उनकी भूमिका ने उन्हें सबसे अलग स्थान दिलाया है। फिल्म निर्माण के लिए मुंबई में जब वह संघर्ष कर रहे थे, तब उनका परिचय नेपाली मूल केे तुलसी घिमिरे से हुआ। तुलसी घिमिरे नेपाली फिल्मों मेें निर्देशक बतौर खूब नाम कमा चुके थे। मुंबई में इसलिए आए थे, कि आंचलिक सिनेमा से ऊपर उठकर बाॅलीवुड जैसे बडे़ फलक पर अपनी चमक बिखेर सके। पाराशर गौैड़ से उनकी मित्रता हुई, तो वह जग्वाल के निर्देशक हो गए। तुलसी घिमिरे निर्देशन के अलावा संपादन के भी माहिर उस्ताद थे। इसलिए ‘जग्वाल ‘ के साथ उनका जुड़ाव पाराशर गौड़ केे लिए दोहरे फायदे वाला साबित हुआ। ‘जग्वाल ‘ केे संगीतकार भी नेपाली मूूल के रणजीत गजमीर थे, जिनका नेपाली फिल्म इंडस्ट्री में बहुत बड़ा नाम था। उन्होंने ‘जग्वाल ‘ के लिए यादगार संगीत रचा।
इस बार 72 वें राष्ट्रीय पुरस्कार में उत्तराखंडी गढ़वाली फिल्म ‘ढोली ‘ को फीचर फिल्म कैटेगरी में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, तो ‘जग्वाल ‘ की भी चर्चा निकल पड़ी है। यह स्वाभाविक भी है। संयोग देखिए, कि इतिहास रचने वाली ‘ढोली’ फिल्म के निर्देशक भी गैर उत्तराखंडी हैं। मराठी मूल के दिनेश पी भोसले की निर्देेशित अन्य फिल्में भी राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुंची हैं। ‘ढोली ‘ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार का सपना उन्होंने ही सबसेे पहले देखा। उनका यह सपना बाद मेें पूरी टीम का सपना बना और कामयाबी हासिल हुई। इस फिल्म को सफलता केे शिखर तक पहुंचाने में डाॅ नंद किशोर हटवाल, नरेंद्र सिंह नेगी, प्रीतम भरतवाण, शिशिर कुमार शर्मा, अतुल विश्नोई, मोहित घिल्डियाल सहित तमाम कलाकारों के प्रयासों का अपना अलग महत्व है।
वैसे, ‘जग्वाल ‘और ‘ढोली ‘की चर्चा करते हुए सृष्टि लखेड़ा की फिल्म ‘एक था गांव ‘ की चर्चा भी करनी जरूरी है। वर्ष 2023 में इसे बेस्ट नाॅन फीचर फिल्म की कैटेगरी में राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हो चुका है। माना जा सकता है कि एक डाक्युमेंट्री फिल्म ‘एक था गांव ‘के रूप में राष्ट्रीय पुरस्कार केे लिए उत्तराखंड वर्ष 2023 में ही दस्तक दे चुका था। हालांकि फीचर फिल्म कैटेगरी में ढोली को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना कहीं बड़ी बात है। उम्मीद ये ही है कि उत्तराखंडी फिल्मों के राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने का क्रम आने वाले दिनों में और मजबूती से आगे बढे़गा।