गीत-गजल की त्रिवेणी में आनंद की डुबकी, मदन डुकलान की गजलों के बहाने गढ़वाली साहित्य पर विमर्श
विपिन बनियाल
-सचमुच, यह गीत-गजल की त्रिवेणी का सा अहसास था। कई-कई धाराएं आकर मिलीं और एकाकार हो गईं। माहौल ऐसा बना, जहां पर हर किसी ने परम आनंद की डुबकी लगाई। छोटे-छोटे वाक्यों से बड़ी-बड़ी बात कह देने वाले उत्कृष्ट लिखवार मदन मोहन डुकलान का यह न्यौता उन सभी केे लिए था, जो गढ़वाली बोली-भाषा में कही गई हर बात को प्यार करते हैं। चाहे फिर यह गीत-गजल या किसी भी अन्य रूप में क्यों न हो।
दोहरी खुशी की वजह साफ थी। एक, पिछले 40 वर्षो से गढ़वाली साहित्य की साधना में जुटे मदन मोेहन डुकलान की एक और किताब का विमोचन हुआ, जिसे नाम दिया गया है-हवे जाज सी उड़दन सुख। यह एक गजल संग्रह है, जिसमें उनकी बेहतरीन गजलों को स्थान मिला है। दो, डुकलान का जलमबार भी साथ ही था। दोहरी खुशी थी, तो दून लायब्रेरी मेें कार्यक्रम भी दो चरणों में हुआ। पहले चरण में, मदन मोहन डुकलान की 40 वर्षों की गढ़वाली साहित्य की यात्रा पर चर्चा हुई। इस क्रम में उनकी चिट्ठी पत्री का बार-बार जिक्र आया। प्रेम सहित अन्य सभी विषयों पर उनके गीतों की चर्चा हुई।
इस चरण में पहाड़ के यशस्वी कलाकार नरेंद्र सिंह नेगी, पूर्व पुलिस महानिदेशक व साहित्यकार अनिल रतूड़ी, पदमश्री प्रीतम भरतवाण, प्रख्यात संस्कृतिकर्मी गणेश खुगशाल गणि के साथ ही गढ़वाली के भाषाविद् डाॅ जगदंबा प्रसाद कोटनाला की खास मौजूदगी ने कार्यक्रम को खास बताया। एक तरफ, मदन मोहन डुकलान की साहित्य यात्रा के जानेे-अनजाने पहलुओं पर विमर्श चलता रहा, वहीं इसकेे ही समानांतर गढ़वाली बोली-भाषा केे उत्थान, उसकी कठिनाई आदि विषयों कोे भी छुआ गया।
दूसरे चरण में, मदन मोहन डुकलान की गजलों को जब नेगीदा, किशन महिपाल, आलोक मलासी, संगीता ढौंडियाल, डाॅ कुसुम भट्ट औैर गिरीश सुंद्रियाल जैसे कलाकारों का कंठ मिला, तो ये गजलें और भी निखर गईं। मां का भावपूर्ण जिक्र हुआ-मेरी मां, तेरू मोल क्वी नी दे सकदू। या फिर, आंख्यू मा सीणा . . .की बात हुई। आज डाल्यूं मुडि छैल नी च की तकलीफ भी उभरी, तो लाशो मां पहाड़ की खौफनाक तस्वीर भी दिखी। कबि घाम, कबि छैल के जरिये जिंदगी में दुख-सुख की अनिवार्य मौजूदगी का दर्शन भी झलक कर बाहर आया। हवाई जहाज की तरह सुख के अल्पकालिक और दुख के लंबी रेलगाड़ी की तरह दीर्घकालिक होने की उस बात को भी सामने रखा गया, जो कि मदन मोहन डुकलान की कलम से बड़ी गंभीरता से निकली है। आंदी-जांदी सांस छै तू के बगैर काफी कुछ अधूरा रह जाना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आंदी-जांदी सांस को हर किसी ने महसूस किया। जीवन में संघर्ष के क्षणों में मजबूत सहारा बनने वाली डुकलान की यह लाइनें सब को फिर से हिम्मत दे गई-कट ही जाला, खैरी का दिन, रे मन किले उदास छै तूू।