अलविदा! डाॅ जंतवाल, आप जैसे लोग राजनीति में कम नहीं होने चाहिए !
-विपिन बनियाल
-करीब बीस वर्ष पहले की बात है। अमर उजाला के स्टेट ब्यूरो में मेरी एंट्री हुई। उस वक्त डाॅ नारायण सिंह जंतवाल यूकेडी के केंद्रीय अध्यक्ष थे। उनसे मेल-मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो पाया कि वह वास्तव में कितने सरल, सहज और अच्छी सोच वाले इंसान थे। यूकेडी तब भी अपने अंतर्द्वंद में उतनी ही उलझी थी, जितनी आज दिखाई देती है। फिर भी, उन अजीबोगरीब स्थितियों के बीच, मुझे डाॅ जंतवाल के व्यक्तित्व ने प्रभावित किया। वह एक सकारात्मक सोच के साथ पर्वतीय हितों की बात करते। यूकेडी को भी उसी अनुरूप आगे ले जाने के लिए वह प्रयासरत दिखाई देते, हालांकि दल के भीतर की जटिलताएं इस कदर हावी थीं, कि ये प्रयास कभी सार्थक साबित होते नहीं दिखाई दिए।
एक उत्तराखंडी होने के नाते जब भी मै यूकेडी से उस वक्त मायूस होता, तो डाॅ जंतवाल से लंबी बहस-मुबाहिसा में उलझ जाता। वह अंदरखाने यूकेडी की स्थितियों को समझते जरूर, लेकिन पूरी दमदारी और समर्पित भाव से पार्टी के पक्ष पर डटे रहते। बीट कवर करते-करते उनके साथ एक आत्मीय रिश्ता बन गया था। मैं उनसे इस रूप में बेहद प्रभावित रहा कि उनके भीतर एक सच्चा पहाड़ी मुझे हर वक्त मौजूद दिखाई देता था। उनके पहनावे, बातचीत, आचार-विचार, सब कुछ में पहाड़ जैसा प्राकृतिक अंदाज ही परिलक्षित होता। फिर वह केंद्रीय अध्यक्ष पद से हट गए और मेरी भी अखबारी जिम्मेदारी बदल गई, तो कई-कई वर्षों तक उनसे कोई संपर्क नहीं हो पाया। आज उनके दुनिया को अलविदा कहने की सूचना आई, तो अफसोस हुआ। वह यूकेडी को एक राजनीतिक ताकत बनते देखने का सपना आंखों में लिए ही विदा हो गए। गैरसैंण राजधानी का उनका सपना भी अभी अधूरा है। दिन-ब-दिन गंदी होती राजनीति में डाॅ नारायण सिंह जंतवाल जैसे लोग कम होते जा रहे हैं, ये दुर्भाग्यपूर्ण है। वह जहां भी रहें, हमेशा खुश रहें। उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि !