नारी विमर्श के आलोक में प्रभावित करती ‘दुर्पदा की लाज’

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विपिन बनियाल
-नारी विमर्श पुरातन विषय है। रामायण, महाभारत काल से लेकर वर्तमान दौर तक नारी विमर्श के आलोक में बस घटनाएं बदली हैं, पात्र बदले हैं। मूल प्रवृत्ति वो ही है। उत्सव ग्रुप उत्तराखंड की नाट्य प्रस्तुति ‘दुर्पदा की लाज’ इस विमर्श को नए अंदाज में छेड़ती है। ‘दुर्पदा’ यानी द्रौपदी और लाज का अर्थ हम सब जानते हैं। महाभारत काल में भरी राजसभा में द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग पर जब भी बात होती है, तब हर कोई विचलित हुए बगैर नहीं रहता।
उत्सव ग्रुप उत्तराखंड ने देहरादून के संस्कृति विभाग के प्रेक्षागृह में दुर्पदा की लाज का जिस अंदाज में मंचन किया, वह झकझोरता है। महाभारत का यह प्रसंग जाना-पहचाना है, जिसकी शुरूआत इस नाटक में दुर्योधन पर द्रौपदी की छींटाकशी से होती है। इसके बाद, बदले की आग, शकुुनि का प्रपंच, द्यूत क्रीडा यानी जुए का खेल, पांडवों की हार, राजसभा में द्रौपद्री का चीरहरण और भगवान वासुदेव की लीला, इत्यादि इत्यादि चीजें इस प्रसंग का हिस्सा बनती चली जाती हैं।
इन स्थितियों के बीच, डॉ राकेश भट्ट की उत्तराखंडी संदर्भ में नाट्य परिकल्पना कमाल की है। उनका निर्देशन सटीक है। संगीत और गायिकी पक्ष के तो क्या ही कहने। गढ़वाली के इस नाटक का जो मिजाज है, कांता घिल्डियाल की कलम उसी के अनुरूप चली है। डॉ राकेश भट्ट की पूरी टीम ने जबरदस्त मेहनत की है, लेकिन घूम-फिर कर बात एक ही केंद्र बिंदु पर टिकी है। निश्चित तौर पर यह केंद्र बिंदु डॉ राकेश भट्ट हैं। वह अपने कंधों पर कई तरह का अतिरिक्त भार लिए हुए हैं। इस नाट्य प्रस्तुति में संगीत पक्ष इसके प्राण की तरह है और यहां पर भी डॉ राकेश भट्ट का पूरा हस्तक्षेप है। उन्होंने न सिर्फ धुनें बढ़िया बनाई हैं, बल्कि अलग-अलग किरदारों के लिए उन्हीं के अनुरूप पार्श्व गायन करके चौंकाया भी है। पार्श्व गायन में जब उन्हें मुकेश हटवाल और कविता भट्ट जैसे मजबूत जोड़ीदार मिलते हैं, तो नाटक का यह विभाग और खिल उठता है।
यूं तो पूरी नाट्य प्रस्तुति में जिस कलाकार को जो जिम्मेदारी मिली, उसने उसे पूरी ईमानदारी से निभाया। इसके बावजूद, कुछ किरदार कई गुना ज्यादा चमकदार होकर उभरे हैं। जाहिर तौर पर इसके पीछे उनके किरदार की बुनावट को माना जा सकता है, जिसने उनके लिए ज्यादा अवसर उपलब्ध कराए। इस क्रम में द्रौपदी (सोनिया नौटियाल) और दुर्योधन (रिपुल वर्मा) को सबसे ज्यादा तारीफ मिलती है। अन्य कलाकारों में विदुर (सुनील मैखुरी), धृतराष्ट्र (राजेश भारद्वाज), शकुुनि (शीशपाल रावत), दुशासन (सुशील पुरोहित) का जिक्र भी किया जा सकता है। कुल मिलाकर डॉ राकेश भट्ट की यह नाट्य प्रस्तुति उद्वेलित करती है। भीतर तक झकझोर देती है।

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