जानिए ! स्वर्गीय जीत सिंह नेगी को क्यों पसंद नहीं था फिल्म में संगीत देना

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विपिन बनियाल

-यह करीब 40 साल पुरानी बात होगी। घरजवैं की कामयाबी से उत्साहित विशेश्वर दत्त नौटियाल ने एक और फिल्म बनाई- ‘हिमालय के आंचल में ‘। इसमें गीत-संगीत रवींद्र जैन का था। हिंदी की इस फिल्म का परिवेश उत्तराखंडी था, हालांकि इसे बहुत कामयाबी नहीं मिल पाई। इसके बाद, फिल्म के गढ़वाली वर्जन पर बात हुई। इसके गीत-संगीत के लिए किसी योग्य व्यक्ति की तलाश की गई। तलाश खत्म हुई स्वर्गीय जीत सिंह नेगी पर आकर, जो एक अच्छे गायक थे। गीत भी अच्छे लिखते थे और उसकी धुन भी बनाते थे। जीत सिंह नेगी से जब संपर्क किया गया, तो उन्होंने संगीतकार बतौर काम करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया। वह इस बात के लिए जरूर तैयार हो गए कि रवीेंद्र जैन के ‘हिमालय के आंचल के लिए’ तैयार किए गए गीत-संगीत को गढ़वाली के हिसाब से ढालने में वह सहयोग कर देंगे। उन्होंने ऐसा किया भी। कई दिन वह मुंबई में रहे और रवींद्र जैन के साथ उनकी कई मीटिंग्स इस संबंध में हुई।
अब बात 22 साल पहले की। एक बार फिर जीत सिंह नेगी के सामने एक प्रस्ताव था कि वह एक फिल्म में गीत-संगीत दोनों का दायित्व संभाल लें। मुकेश धस्माना की इस फिल्म का नाम था- ‘मेेरी प्यारी बोई ‘। नेगीजी ने संगीतकार बतौर काम करने का प्र्रस्ताव ठुुकरा दिया। हालांकि वह गीत लिखने के लिए तैयार हो गए। उनकी संस्तुति पर संतोष खेतवाल को यह जिम्मेदारी दी गई। फिल्म का गीत-संगीत हिट रहा।
किसी भी फिल्म में संगीत देने के सवाल पर जीत सिंह नेगी क्यों हिचकते थे, जबकि उन्हें संगीत की बहुत अच्छी समझ थी। यह एक अहम सवाल रहा, जबकि नरेंद्र सिंह नेगी जैसे दिग्गज कलाकार ने भी कई मौकों पर स्वीकार किया कि जीत सिंह नेगी जैसे गायकों से प्रेरित होकर उनकी संगीत यात्रा आगे बढ़ी है। नरेंद्र सिंह नेगी ने तो उनके गाए कई गीतों को गाकर उन्हें ट्रिब्यूट दिया है। जब नरेंद्र सिंह नेगी ने उनके गीतों पर एक कैसेट निकाला था, तब जीत सिंह नेगी जीवित थे और इस प्रयास से वह प्रसन्न व संतुष्ट नजर आए थे।
खैर, सवाल ये था कि जीत सिंह नेगी फिल्मों में संगीत देने से क्यों बचते थे। इस सवाल का मुझे मुनासिब जवाब मिला, निर्माता निर्देशक व अभिनेता मुकेश धस्माना से। बकौल, मुकेश धस्माना-नेगी जी कहा करते थे कि एक गैर फिल्मी गाने का संगीत देना अलग बात है, लेकिन फिल्म के लिए उसकी पूरी आत्मा, पृष्ठभूमि को समझते हुए संगीत देना जटिल काम है, जिसके लिए वह खुद को उपयुक्त नहीं पाते। स्वर्गीय जीत सिंह नेगी की यह साफगोई सैल्यूट लायक है, जबकि हम जानते हैं कि उन्होंने अपने कई गीतों को न सिर्फ बेहतरीन ढंग से गाया, बल्कि उसे लिखने से लेकर संगीतबद्ध करने तक का काम बखूबी निभाया। विशेषज्ञता को लेकर उनका नजरिया कमाल का था और यही कारण था, कि वह फिल्मोें में संगीत देने से परहेज करते थे। सरल, सादे व्यक्तित्व वाले जीत सिंह नेगी के गीतों में भी पहाड़ की सरलता के दर्शन हुए हैं। ‘तू होली ऊंचा डांडयू मा बीरा, घसियारी का भेष मा ‘ या फिर ‘घास काटीक प्यारी छैला हेे ‘ जैसे उनके गीत कालजयी हैं। वह एक बेहतरीन अभिनेता भी थे और उनके रंगमंच के जीवन की अलग कहानी है। उन्हें उनकी तमाम सारी बातों के लिए याद किया जाता है। एक और खास बात, जो उनसे जुड़ी है। यह बात उनके उत्तराखंड के पहले ऐसे लोक गायक होने की है, जिनके गीतों को वर्ष 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोम कंपनी ने रिकार्ड किया था। यह कंपनी बाद में एचएमवी के नाम से दुनिया में पहचानी गई। 21 जून 2020 को उत्तराखंडी लोक संगीत का यह सितारा अस्त हो गया। आज उनकी पुण्यतिथि है। उन्हें शत शत नमन।

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