पदमश्री मिले, तो तब एस जानकी जैसा दम दिखाना नेगी दा !

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-विपिन बनियाल

-एस.जानकी के रूप में भारतीय संगीत जगत का एक और सितारा अस्त हो गया। अपनी उत्कृष्ट गायिकी से एस.जानकी महान बनीं और बड़ा मुकाम हासिल किया। उनके निधन की पृष्ठभूमि में मैं नरेंद्र सिंह नेगी का जिक्र कर रहा हूं, तो इसकी खास वजह है। वर्ष 2013 में एस.जानकी को भारत सरकार ने पदम भूषण देनेे की घोषणा की, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। एस. जानकी ने कहा-यह सम्मान दिए जाने में बहुत देर हो चुकी है। पद्म पुरस्कार बेहद सम्मानीय हैं, मगर यह तथ्य भी अपनी जगह है कि एस.जानकी के मामले में सचमुच बहुत देर की गई। एस.जानकी ने अपने छह दशक सेे भी ज्यादा लंबे संगीत कॅरियर में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में 48 हजार सेे ज्यादा गीत गाए। उन्हें पदम भूषण देने की याद वर्ष 2013 में आई । एस.जानकी के इस फैसले को हर कोई अपने नजरिये से देख सकता है, लेकिन ये भी सच्चाई है कि इस तरह के फैसले के लिए बहुत बड़ा जिगर चाहिए होता है।
खैर, अब नरेंद्र सिंह नेगी पर लौटते हैं, जो उत्तराखंडी लोक संगीत में जडे़ किसी नगीने की तरह हैं। पांच दशक से ज्यादा लंबी अपनी संगीत यात्रा में उन्होंने आम जन को हर उस रंग से वाकिफ कराया हैै, जोे हमारेे जीवन मेें घुला-मिला है। उनकी रचनाधर्मिता से अनगिनत ऐेसे गीत निकले हैं, जो कालजयी हैं और पहाड़ के लोक जीवन का प्रतिबिंब हैं। उत्तराखंडी लोक संगीत के क्षेत्र में नरेंद्र सिंह नेगी की तरह ही और भी कई महान शख्सियत रही हैं। मगर पहाड़ के विशाल परिप्रेक्ष्य को समझते हुए नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने गीतों में उन्हें जिस हिसाब से जगह दी है, वह अद्वितीय है।
एस.जानकी के निधन के बाद उनके पदम भूषण से जुड़े वाक्ये की नए सिरेे से चर्चा हो रही है। इन स्थितियों के बीच, पदम पुरस्कारों केे लिए नामांकन प्रक्रिया गतिमान है। नरेंद्र सिंह नेगी को एक अदद पदमश्री सम्मान का विषय फिर से मौजूं है। यह एक ऐसा विषय है, जो उनके प्रशंसकों को बार-बार कचोटता है। नेगी जी को पदम पुरस्कार मिलेगा या नहीं, या फिर कब तक मिलेगा, ऐसे कई सारी बातें हैं। अनजाने सेे सवाल हैं। मगर मेरे मन में एक ख्याल जरूर उमड़-घुमड़ रहा है। भूले से नेगी जी को कभी पदमश्री के लिए नामित कर लिया जाए, तो क्या उन्हें एस.जानकी की तरह दम नहीं दिखाना चाहिए। क्योंकि देेर तो उनके मामले में भी बहुत हो चुकी है। कम से कम पदमश्री तो उनके अप्रतिम योेगदान का उचित सम्मान नहीं होगा। नेगी जी इस बारे में खुद क्या सोचते हैं, यह अलग और महत्वपूर्ण बात होगी।
वैसे, चाहे एस.जानकी हों या फिर नरेंद्र सिंह नेगी, समाज से उन्हेें जो सम्मान मिला है, उसके आगे हर पुरस्कार का प्रभाव कमतर ही है। यही वजह है कि एस.जानकी अपनी गायिकी, अपनेे आचरण और अपनेे अंदाज से ‘जानकी अम्मा’ बन जाती हैं। नरेंद्र सिंह नेगी की बात करें, तो वह उत्तराखंडी समाज के ‘नेगीदा’ हैं।

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