शुरू से था ‘ढोली’ की आंखों में राष्ट्रीय पुरस्कार का सपना, मोहित घिल्ड़ियाल ने खोले फिल्म की सफलता के राज
-उत्तराखंडी गढ़वाली फिल्म ढोली ने जीता राष्ट्रीय पुरस्कार
-43 वर्ष के सिनेमाई इतिहास में मिला है गर्व का अवसर
-रिलीज होने से पहले ही लहराया ढोली फिल्म का परचम
विपिन बनियाल
-अपने 43 वर्ष के इतिहास में उत्तराखंडी सिनेमा पहली बार गर्व व हर्ष से झूम रहा है। हर्षित और गर्वित करने वाले ये पल गढ़वाली फिल्म ‘ढोली’ ने प्रदान किए हैं। पहली बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली इस फिल्म की कामयाबी वास्तव में बहुत बड़ी है, लेकिन ये यूं ही प्राप्त नहीं हुई, बल्कि इसके लिए पहले दिन से ही आंखों में एक सपना पला, उसके लिए मेहनत हुई और सुखद परिणाम अब सबके सामने हैं।
यह फिल्म अभी तक रिलीज नहीं हुई है। फिल्म के निर्माता सुनील नायक और निर्देशक दिनेश पी भोसले का यह निर्णय था कि फिल्म को पहले 72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के लिए भेजा जाएगा। ढोली में मुख्य किरदार निभाने वाले मोहित घिल्डियाल के अनुसार-निर्देशक दिनेश पी भोसले ने फिल्म बनाने से पहले ही इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार का सपना देखा था। टीम जैसे-जैसे जुटी, यह सपना फिर किसी एक का नहीं रहा, बल्कि पूरी यूनिट का हो गया।
ढोली फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार की फीचर फिल्म श्रेणी में रजत कमल पुरस्कार प्रदान किया गया है। प्रसिद्ध लेखक नंदकिशोर हटवाल के नाटक जमनदास ढोली पर यह फिल्म बनी है, जिसमें फिल्म की आवश्यकता के अनुरूप कथा विस्तार का काम शिशिर कुमार ने किया है। उत्तराखंडी समाज और ढोली के रिश्ते को फिल्म में बखूबी उकेरा गया है।
फिल्म में ढोली बने मोहित घिल्ड़ियाल गांव से ही निकले हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग की है, लेकिन पहला प्यार अभिनय है। इसलिए मुंबई में कई सीरियल में काम किया। पहली मर्तबा गढ़वाली फिल्म में मौका मिला, तो राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ जिंदगी में खुशियों की बहार आ गई है। बकौल, मोहित-खुशी बेहद है। अभिव्यक्ति मुश्किल है। पहली ही फिल्म और उसे राष्ट्रीय पुरस्कार, यह सपने के सच हो जाने जैसा है।
पौड़ी जिले के खोला गांव से मोहित ताल्लुक रखते हैं, जिनकी प्रारंभिक शिक्षा स्वीत गांव में हुई है। गांव के माहौल को मोहित ने बहुत करीब से देखा है। मोहित कहते हैं-फिल्म की जो विषय वस्तु हैं, उसे शिद्दत से महसूस किया है। फिल्म का जो हिस्सा है, उसे बचपन से असल जिंदगी में देखते आ रहे हैं। इसलिए पर्दे पर उसे जीने में कोई दिक्कत पेश नहीं आई।
कमाल हैं भोसले सर, गजब है उनका जुनून
-मोेहित घिल्डियाल फिल्म के निर्देशक दिनेश पी भोसले से खासे प्रभावित हैं। मोहित बताते हैं-फिल्म की ज्यादातर शूटिंग उत्तरकाशी जिले में हुई है। सेट पर सुबह छह बजे सबसे पहले भोसले सर पहुंच जाया करते थे। उन्होंने ढोलियों के जीवन, रहन-सहन, सामाजिक स्थिति पर अपने स्तर से खूब रिसर्च की। उनकी मराठी पृष्ठभूमि है, लेकिन फिल्म के साथ उनका सबसे गहरा जुड़ाव रहा। वह थोड़ा बहुत गढ़वाली भी बोलने लगे थे।
